
सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण के मामले अब सीधे हाईकोर्ट नहीं पहुंचेंगे: नागौर में जिला स्तरीय प्रकोष्ठ करेगा सुनवाई
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राजस्थान हाईकोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण के मामलों में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अब चरागाह, तालाब, जोहड़, सार्वजनिक रास्ते, श्मशान और कब्रिस्तान जैसी सार्वजनिक जमीनों पर अतिक्रमण की शिकायतों का निस्तारण सीधे उच्च न्यायालय में नहीं, बल्कि जिला स्तर पर गठित सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ (पीएलपीसी) द्वारा किया जाएगा। इस नए निर्देश का उद्देश्य जिला स्तर पर ही ऐसे विवादों को सुलझाना और हर मामले में सीधे हाईकोर्ट पहुंचने की आवश्यकता को कम करना है।
हमारे खींवसर संवाददाता के अनुसार, यह निर्णय नागौर जिले के खींवसर तहसील के तांतवास गांव से जुड़े छह याचिकाकर्ताओं की अपील पर आया है। राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश संजय के. अग्रवाल और न्यायाधीश बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने 14 अक्टूबर को इन याचिकाकर्ताओं की सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया।
शिकायत प्रक्रिया और समय-सीमा:
- शिकायतकर्ता सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ (पीएलपीसी) के समक्ष अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
- संबंधित अधिकारियों को प्रमाणित आदेश प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर कानून के अनुसार उस पर निर्णय करना होगा।
- इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य सार्वजनिक जमीन पर अतिक्रमण से संबंधित शिकायतों का स्थानीय स्तर पर, विशेषकर जिला स्तर पर प्रभावी ढंग से समाधान करना है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट ने 30 जनवरी, 2019 को जगदीश प्रसाद मीणा व अन्य बनाम राजस्थान राज्य मामले में ग्रामीण क्षेत्रों की सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए प्रत्येक जिले में पीएलपीसी के गठन के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने वर्तमान याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ताओं को पीएलपीसी के समक्ष अभ्यावेदन देने की छूट दी है। साथ ही यह भी निर्देश दिया है कि प्रमाणित आदेश प्राप्त होने की तारीख से दो महीने के भीतर नियमानुसार निर्णय लिया जाए।
पुराने कब्जे से नहीं मिलता जमीन पर हक:
हाईकोर्ट ने अपने 2019 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 'जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य' मामले का भी उल्लेख किया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, ग्राम सभा और पंचायत की सार्वजनिक जमीन को अवैध कब्जों से मुक्त कराकर गांव के सामुदायिक उपयोग के लिए बहाल किया जाना चाहिए। केवल लंबे समय से कब्जा होने, निर्माण पर रकम खर्च करने या राजनीतिक पहुंच होने से अवैध कब्जा वैध नहीं हो जाता। नियमितीकरण केवल सीमित अपवादस्वरूप परिस्थितियों में और सरकार की अधिसूचना के तहत ही संभव है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने किसी विशेष जमीन पर अतिक्रमण साबित नहीं माना और न ही सीधे कब्जा हटाने का आदेश दिया है। इसके बजाय, याचिकाकर्ताओं को जिला स्तर पर पीएलपीसी से शिकायत करने का विकल्प दिया गया है, और अधिकारियों को उस पर दो महीने में निर्णय लेना होगा।
निस्तारण न होने पर हाईकोर्ट का विकल्प:
2019 के आदेश के अनुसार, यदि पीएलपीसी द्वारा कार्रवाई नहीं होती है, तो हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का रास्ता भी बंद नहीं है। हाईकोर्ट ने पहले कहा था कि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण की शिकायतों के बावजूद राजस्व अधिकारियों की ओर से कार्रवाई नहीं होने पर लोगों को जनहित याचिकाएं दायर करनी पड़ती हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में पीएलपीसी गठित करने और आमजन को शिकायत दर्ज कराने की जानकारी देने के निर्देश दिए गए थे। प्रकोष्ठ शिकायत की जांच उपखंड अधिकारी, तहसीलदार या नायब तहसीलदार से करवाएगा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जनहित में उचित कार्रवाई की जाए।
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नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।