
नागौर: बड़ली में पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट, कलेक्टर ने स्वीकारी 38 साल की प्रशासनिक चूक
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नागौर शहर के बड़ली क्षेत्र में गुरुवार सुबह हुए एक भीषण पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट ने पूरे जिले को हिलाकर रख दिया है। इस दुखद हादसे में दो युवकों की दर्दनाक मौत हो गई, जिनके शव इतनी बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गए कि उन्हें पहचानना मुश्किल था। इस घटना ने प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि जिला कलेक्टर देवेंद्र कुमार ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह कारखाना 38 साल से अधिक समय से बिना नियमित भौतिक निरीक्षण के संचालित हो रहा था, जबकि लाइसेंस का नवीनीकरण कागजों में होता रहा।
प्रशासनिक चूक पर कलेक्टर का बयान
हमारे नागौर संवाददाता के अनुसार, जिला कलेक्टर देवेंद्र कुमार ने इस मामले में एक बड़ी प्रशासनिक चूक की बात स्वीकार की है। उन्होंने बताया कि इस स्थान को साल 1988 में 'सोरघर' के नाम से पटाखा निर्माण और भंडारण के लिए आवंटित किया गया था। शुरुआती जानकारी के अनुसार, यहां अधिकतम 15 किलोग्राम विस्फोटक बनाने की अनुमति थी।
कलेक्टर ने जोर देकर कहा कि इतने लंबे समय से लाइसेंस का नवीनीकरण तो होता रहा, लेकिन मौके पर कभी नियमित भौतिक निरीक्षण नहीं किया गया। उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि समय-समय पर इस स्थान का निरीक्षण किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब इस गंभीर हादसे के बाद, लाइसेंस से जुड़े सभी दस्तावेजों, नवीनीकरण की प्रक्रिया और सुरक्षा मानकों की गहन जांच की जाएगी। प्रशासन यह भी पता लगाएगा कि मौके पर वास्तव में कितनी मात्रा में विस्फोटक का भंडारण किया जा रहा था और कितना उपयोग में लाया जा रहा था।
धमाके की भयावहता
यह धमाका इतना जबरदस्त था कि इसकी आवाज करीब एक किलोमीटर दूर तक सुनाई दी। आसपास के मकानों की दीवारों में दरारें आ गईं और करीब 100 मीटर दूर खड़ी एक बस के शीशे चकनाचूर हो गए। विस्फोट में मारे गए दोनों युवकों के शव बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गए थे। राहत एवं बचाव दल को अलग-अलग स्थानों पर बिखरे शवों के अवशेषों को एकत्रित कर पॉलीथिन बैग में रखना पड़ा, जो घटना की भयावहता को दर्शाता है।
तहसीलदार ने दी खसरा नंबर की जानकारी
नागौर तहसीलदार नरसिंह राम टाक ने बताया कि खसरा नंबर 484 गैर मुमकिन सोरघर के नाम से आवंटित है। साल 1988 से ही यहां पटाखा निर्माण और भंडारण की गतिविधियां संचालित की जा रही थीं। अब जांच में यह भी देखा जाएगा कि लाइसेंस की शर्तों के अनुसार ही पटाखों का निर्माण और भंडारण किया जा रहा था या नहीं। इसके लिए लाइसेंस और उससे जुड़े दस्तावेजों की बारीकी से जांच की जाएगी।
चार दशक तक निगरानी क्यों नहीं?
यह हादसा पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है और इसने प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यह सवाल उठ रहा है कि करीब चार दशकों से संचालित हो रहे इस विस्फोटक निर्माण और भंडारण स्थल का नियमित निरीक्षण क्यों नहीं हुआ? लाइसेंस का नवीनीकरण किस प्रक्रिया के तहत होता रहा और सुरक्षा मानकों की जांच क्यों नहीं की गई? यदि समय रहते नियमित निरीक्षण और सुरक्षा मानकों की जांच की जाती, तो क्या इस भीषण हादसे को टाला जा सकता था?
प्रशासन ने अब पूरे मामले की गहन जांच कराने की बात कही है। जांच में यह स्पष्ट होगा कि मौके पर विस्फोटक की वास्तविक मात्रा कितनी थी, लाइसेंस की शर्तों का पालन हो रहा था या नहीं और सुरक्षा व्यवस्था में कहां चूक हुई। हमारी टीम लगातार इस मामले पर नजर बनाए हुए है और पल-पल की अपडेट आप तक पहुंचाएगी।
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Written & Verified By
नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।