
नागौर: पटाखा फैक्ट्री में भयानक ब्लास्ट, 2 की मौत, शरीर के अंग लापता, जांच शुरू
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नागौर शहर में एक पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण धमाके में दो भाइयों की दर्दनाक मौत हो गई है। इस हादसे के बाद क्षेत्र में सन्नाटा पसरा हुआ है और मृतकों के परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। घटना की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि धमाके के चलते मृतकों के शरीर के अंग अभी भी लापता हैं। आसपास के निवासियों ने एक के बाद एक तीन जोरदार धमाके होने का दावा किया है, जिसकी गूंज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई दी थी।
हमारे नागौर संवाददाता के अनुसार, स्थानीय लोगों ने बताया कि ब्लास्ट इतना प्रचंड था कि फैक्ट्री की छत के 7 किलो वजनी पत्थर और शरीर के कुछ हिस्से 150 मीटर (लगभग 500 फीट) दूर उनके घरों के बाड़ों में जाकर गिरे। एक प्रत्यक्षदर्शी ने अपने घर के बाड़े में एक युवक का हाथ गिरने की बात बताई है। वहीं, इस घटना को लेकर कलेक्टर ने भी बड़ी प्रशासनिक चूक स्वीकार की है, उनका मानना है कि फैक्ट्री का सालाना निरीक्षण नहीं हुआ था। अब इस हादसे के बाद फैक्ट्री के लाइसेंस, नवीनीकरण और सुरक्षा इंतजामों की गहन जांच की जाएगी।
प्रत्यक्षदर्शियों का दर्दनाक बयान: एक के बाद एक तीन धमाके
- बड़ली इलाके में रहने वाले सीताराम ने बताया कि वह अपने घर में थे, तभी रात करीब 9:40 बजे एक जोरदार धमाका सुनाई दिया। पहले उन्हें लगा कि यह किसी ट्रांसफार्मर का धमाका है।
- इसके तुरंत बाद दूसरा धमाका हुआ, जिससे उन्हें आभास हुआ कि पटाखा फैक्ट्री में कोई घटना हुई है। इसके बाद एक और तीसरा धमाका हुआ, जिसने पूरे क्षेत्र को दहशत में डाल दिया।
- सीताराम ने बताया कि इन धमाकों के दौरान उनके घर के बाड़े की दीवार के पास मांस का एक टुकड़ा आकर गिरा, और पड़ोसियों ने बताया कि एक हाथ भी बाड़े में गिरा है। उनके पिता खाट पर बैठे थे, उनसे कुछ दूरी पर एक पत्थर गिरा, और उनकी भतीजी के पास भी बर्तन धोते समय पत्थर गिरे, जिससे सभी बाल-बाल बचे।
- धमाकों के बाद वे पटाखा फैक्ट्री की ओर दौड़े, जहां से घना धुआं निकल रहा था और पूरी फैक्ट्री तबाह हो चुकी थी। वहां और धमाके होने की आशंका के कारण, डरते-डरते पुलिस को सूचना दी गई। इसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बिखरे हुए शरीर के अंगों को इकट्ठा किया।
कलेक्टर ने मानी प्रशासनिक चूक, जांच के आदेश
कलेक्टर देवेंद्र कुमार ने इस भयावह हादसे को लेकर गंभीर प्रशासनिक चूक स्वीकार की है। उन्होंने बताया कि यह स्थान वर्ष 1988 में 'सोरघर' के नाम से पटाखा निर्माण और भंडारण के लिए आवंटित किया गया था। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, यहां अधिकतम 15 किलो विस्फोटक बनाने की अनुमति थी। कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि लाइसेंस का नवीनीकरण तो नियमित रूप से होता रहा, लेकिन मौके पर किसी भी तरह का भौतिक निरीक्षण नहीं किया गया, जो कि एक बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है। उन्होंने कहा कि इस स्थान का समय-समय पर निरीक्षण किया जाना अनिवार्य था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अब इस भयानक हादसे के बाद प्रशासन ने लाइसेंस से जुड़े सभी दस्तावेजों, नवीनीकरण की प्रक्रिया और सुरक्षा मानकों की गहन जांच के आदेश दिए हैं। प्रशासन यह भी पता लगाएगा कि मौके पर वास्तव में कितनी मात्रा में विस्फोटक रखा गया था और कितना उपयोग में लाया जा रहा था। नागौर तहसीलदार नरसिंह राम टाक ने पुष्टि की है कि खसरा नंबर 484 गैर मुमकिन सोरघर के नाम से आवंटित है और वर्ष 1988 से ही यहां पटाखा निर्माण व भंडारण की गतिविधियां जारी थीं। जांच में इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि सभी गतिविधियां लाइसेंस की शर्तों के अनुरूप थीं या नहीं।
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नागौर के युवा पत्रकार और डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ। अभिषेक जी को ग्रामीण विकास और स्थानीय समस्याओं के सटीक विश्लेषण का गहरा अनुभव है।